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ग्राम भंडूरा में आदित्य प्रहलाद पाहुजा का जोरदार स्वागत, ग्रामीणों ने जताया समर्थन ‎राजकीय इंटर कॉलेज में वोकेशनल कोर्स पर सालाना 10 लाख से ज्यादा खर्च पर उपकरणों का अभाव ‎ ‎**फोटोग्राफी के लिए कैमरा नहीं, रेडियो-टीवी के लिए जरूरी टूल्स भी नदारद; बच्चों का समय और पैसा भी हो रहा खर्च** ‎ ‎-नरेश मित्तल- ‎ ‎**मुजफ्फरनगर।** युवाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित योजनाओं पर सरकारी धन खर्च हो रहा है, लेकिन राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी) में वोकेशनल कोर्स की जमीनी हकीकत सवाल खड़े कर रही है। यहां चार व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित हैं, जिन पर सालाना 10 लाख रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। इसके बावजूद विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए जरूरी उपकरणों का अभाव है। ‎ ‎ ‎**कैमरा नहीं तो फोटोग्राफी कैसे सीखेंगे?** ‎ ‎कॉलेज में कंप्यूटर कोर्स में 30 और बाकी तीनों कोर्स में 10-10 विद्यार्थी नामांकित हैं। कंप्यूटर और टाइपिंग के लिए कंप्यूटर उपलब्ध हैं, लेकिन फोटोग्राफी के लिए कैमरा और रेडियो-टीवी की पढ़ाई के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। ऐसे में विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलने पर सवाल उठता है। ‎ ‎रेडियो और टीवी’ कोर्स ‎ ‎आज के स्मार्ट फोन, एलईडी और डिजिटल युग में इस कोर्स का नाम और प्रासंगिकता अपने आप में एक बड़ा सवालिया निशान बन गई है। जब कॉलेजों में आज के दौर के हिसाब से आधुनिक लैब, उपकरण या टीवी-रेडियो के प्रैक्टिकल सेट तक उपलब्ध नहीं हैं, तो यह सिर्फ कागजों पर चलने वाला एक पारंपरिक कोर्स बनकर रह गया है। ‎ ‎प्रधानाचार्य सुभाष चंद के अनुसार, कंप्यूटर, टाइपिंग, फोटोग्राफी और रेडियो-टीवी कोर्स के लिए चार संविदा शिक्षक तैनात हैं। प्रत्येक को 20 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। इस तरह शिक्षकों के वेतन आदि पर सालाना लगभग दस लाख रुपये खर्च होते हैं। ‎ ‎**बच्चों का समय और पैसा भी दांव पर** ‎ ‎विद्यार्थी हुनर सीखकर रोजगार पाने की उम्मीद में कॉलेज आते हैं। उन्हें आने-जाने में समय और किराया खर्च करना पड़ता है। यदि जरूरी उपकरणों पर अभ्यास ही नहीं मिलेगा, तो पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वे कितने कुशल बन पाएंगे? ‎ ‎सर्टिफिकेट थमाने की मशीन? ‎ ‎​राजकीय इंटर कॉलेज के इन वोकेशनल कोर्सेज की मौजूदा स्थिति को देखकर साफ जाहिर होता है कि ये कोर्स छात्रों के भविष्य को संवारने के बजाय केवल उन्हें एक सर्टिफिकेट थमाने का माध्यम बन चुके हैं। बिना संसाधनों के चल रहे इन कोर्सेज से न तो छात्रों का भला हो रहा है और न ही सरकार का ‘कौशल भारत’ का सपना ज़मीन पर उतर पा रहा है। ‎ ‎ ‎”वोकेशनल कोर्सस में उपकरण आदि के लिए हमारे पास अन्य कोई भी किसी भी तरह का बजट नहीं आता है, जिसके कारण हम फोटोग्राफी के लिए कैमरा आदि उपकरण नहीं खरीद पाए हैं।” ‎— सुभाष चंद, प्रधानाचार्य, जीआईसी खेड़ी फिरोज़ाबाद व जौली में जल निकासी की समस्या के स्थायी समाधान को लेकर जलशक्ति राज्यमंत्री को सौंपा मांग पत्र उपनिरीक्षकों के विरुद्ध गंगनहर कोतवाली में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज तेजतर्रार रामलीला टिल्ला चौकी इंचार्ज गोविन्द चौधरी के नेतृत्व मे नशा तस्कर के विरुद्ध बड़ी कार्यवाही!
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‎राजकीय इंटर कॉलेज में वोकेशनल कोर्स पर सालाना 10 लाख से ज्यादा खर्च पर उपकरणों का अभाव ‎ ‎**फोटोग्राफी के लिए कैमरा नहीं, रेडियो-टीवी के लिए जरूरी टूल्स भी नदारद; बच्चों का समय और पैसा भी हो रहा खर्च** ‎ ‎-नरेश मित्तल- ‎ ‎**मुजफ्फरनगर।** युवाओं को हुनरमंद बनाकर रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित योजनाओं पर सरकारी धन खर्च हो रहा है, लेकिन राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी) में वोकेशनल कोर्स की जमीनी हकीकत सवाल खड़े कर रही है। यहां चार व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित हैं, जिन पर सालाना 10 लाख रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। इसके बावजूद विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए जरूरी उपकरणों का अभाव है। ‎ ‎ ‎**कैमरा नहीं तो फोटोग्राफी कैसे सीखेंगे?** ‎ ‎कॉलेज में कंप्यूटर कोर्स में 30 और बाकी तीनों कोर्स में 10-10 विद्यार्थी नामांकित हैं। कंप्यूटर और टाइपिंग के लिए कंप्यूटर उपलब्ध हैं, लेकिन फोटोग्राफी के लिए कैमरा और रेडियो-टीवी की पढ़ाई के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। ऐसे में विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलने पर सवाल उठता है। ‎ ‎रेडियो और टीवी’ कोर्स ‎ ‎आज के स्मार्ट फोन, एलईडी और डिजिटल युग में इस कोर्स का नाम और प्रासंगिकता अपने आप में एक बड़ा सवालिया निशान बन गई है। जब कॉलेजों में आज के दौर के हिसाब से आधुनिक लैब, उपकरण या टीवी-रेडियो के प्रैक्टिकल सेट तक उपलब्ध नहीं हैं, तो यह सिर्फ कागजों पर चलने वाला एक पारंपरिक कोर्स बनकर रह गया है। ‎ ‎प्रधानाचार्य सुभाष चंद के अनुसार, कंप्यूटर, टाइपिंग, फोटोग्राफी और रेडियो-टीवी कोर्स के लिए चार संविदा शिक्षक तैनात हैं। प्रत्येक को 20 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। इस तरह शिक्षकों के वेतन आदि पर सालाना लगभग दस लाख रुपये खर्च होते हैं। ‎ ‎**बच्चों का समय और पैसा भी दांव पर** ‎ ‎विद्यार्थी हुनर सीखकर रोजगार पाने की उम्मीद में कॉलेज आते हैं। उन्हें आने-जाने में समय और किराया खर्च करना पड़ता है। यदि जरूरी उपकरणों पर अभ्यास ही नहीं मिलेगा, तो पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद वे कितने कुशल बन पाएंगे? ‎ ‎सर्टिफिकेट थमाने की मशीन? ‎ ‎​राजकीय इंटर कॉलेज के इन वोकेशनल कोर्सेज की मौजूदा स्थिति को देखकर साफ जाहिर होता है कि ये कोर्स छात्रों के भविष्य को संवारने के बजाय केवल उन्हें एक सर्टिफिकेट थमाने का माध्यम बन चुके हैं। बिना संसाधनों के चल रहे इन कोर्सेज से न तो छात्रों का भला हो रहा है और न ही सरकार का ‘कौशल भारत’ का सपना ज़मीन पर उतर पा रहा है। ‎ ‎ ‎”वोकेशनल कोर्सस में उपकरण आदि के लिए हमारे पास अन्य कोई भी किसी भी तरह का बजट नहीं आता है, जिसके कारण हम फोटोग्राफी के लिए कैमरा आदि उपकरण नहीं खरीद पाए हैं।” ‎— सुभाष चंद, प्रधानाचार्य, जीआईसी

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